कुछ खरोंच लिए
मलहम ढूंढता
दर तेरे आया था मैं
मांगते हुए तुझसे रहम
मन में तो बहुत सकुचाया था मैं
रोशनी दिखी
दौड़ पड़ा था मैं
राह पत्थर से टकर
फिर से गिरा खुद को पाया था मैं
सन्नाटा था हर कहीं
और थी गूंज सिसकियों की
मेरे खुद के चोट के दर्द में
जिन्हें सुन न पाया था मैं