Monday, October 17, 2016

घास

घास
नन्हें कोमल घास
हरयाली के प्रतीक घास

बाग़ बगीचों में घास
राह पगडंडियों पे घास
देसी घास
विदेशी घास

खेल के मैदानों में
खेतों और खलिहानों में
उखड़ती, फिर पनपती घास
कहीं सिंची
कहीं अनसिंची घास

गर्म धूप, बारिश
बर्फ और ओले
सब सहते घास
बढ़ते ही
किसी मवेशी का चारा
बनते घास

ओस की मोतियों को सँजोते घास
नए दिन का एहसास दिलाते घास
खुदपे चलने वालों के तलवे सहलाते घास

इक ज़मी, इक आसमाँ
बिन फले-फूले, बिन कोई आस
खिलती, कुम्हलाती घास
यूँही पनपते, रौंदे जाते घास

ज़मीं जकड़े
बिन चीखे
चुपचाप सहते
खुद में सिमटते घास

रात होने पर
चाँदनी में नहलाते घास
अगली सुबह, फिर तरो ताज़ा
हो जाते घास
फिर बन जाते
किसी की हरियाली के
प्रतीक ये घास

Saturday, October 15, 2016

जब भी मैंने तुमको देखा...




ज़िन्दगी को खिलखिलाते देखा
खुल के झूमते नाचते देखा
पंख लगाये सपनों को
उड़ान भरते देखा
चाहतों को बेबाक,
बेपरवाह होते देखा
सच में, या सपने में
जब भी मैंने तुमको देखा...

झूठ हैं,
हैं सच कई,
किस्से ग़म के,
हैं खुशी के कई,
सब लतीफों को
तुम पर उमड़ते देखा...
सच में या सपने में
जब भी मैंने तुमको देखा...

संगीतों से सजी
इठलाती इतराती
तितलयों को
रंग बिरंगे फूलों पे
मंडराते देखा है
जब भी मैंने तुमको देखा है...

अलसाती धूप
पेड़ों से छन के आती
ओस की बूँदों को
सुनहरा बनाती
तृप्त तन तृण क
किरणों में मदमाते देखा है
सच में या सपनें में 
जब भी मैंने तुमको देखा है...

सागर किनारे,
पीछे बाँह पसारे
जैसे युगल कोई
खोये ख्यालों में
देख रहा हो
चाँदनी और सितारे
उनकी तस्वीर में
खुद को उतरते देखा है....
जब मैंने तुमको देखा है।

Friday, October 14, 2016

सौगात

शाम ढ़लने को है
अब तो रात आ रही है
साथ संगीतों से सजी
तेरी हर बात ला रही है

कुछ क़दम चल के
रुक-सा जाता हूँ मैं
हर राह की मन्ज़िल
तुम तक पाता हूँ मैं

अब यूँ ठहरकर, क्यूँ देर कर रहा
छोटी मुश्किलों से क्यूँ बेवज़ह डर रहा

क्या कहें तुम्हें, सब कह तो दिया
सब फैसले तुम्हारे, बस इंतज़ार है लिया

ये रात कब ढलेगी
कब सुबह आएगी
साथ आहट की तेरी
कब सौगात लाएगी?

(11 Aug 2002)

ये ज़िंदगी

क्यूँ असमंजस सी ज़िन्दगी
दिखती, कभी दूर, कभी पास है
अस्त व्यस्त हो कभी
कभी संजीदा-सा एहसास है

धड़-पकड़ में लगे हुए
हम किन खुशियों के
क्या यही खुशियाँ हैं
या सूखा आभास है

उम्मीदों के नगर में
बुने थे सपने कई
सपने हैं सलामत अभी भी
पर कई उलझनों के हम दास हैं

इन दिनों

इन दिनों
गुजरता हूँ कई इम्तहानों से
बेबस और बेसब्र हो उठता
छोटी खुशिओं और अरमानों से

है न ज़रिया
न दूकान कहीं
तुम्हारा साथ मिलना
क्यूँ इतना आसान नहीं

शब्द ख़त्म हो  गए
है चाह वही
तुझसे शुरू और ख़त्म
हर राह नई

प्यासा तेरा
किस्से कशमकश के कहता किसे
फिर भी बढ़ा बाबरा
उस राह पे
कहते इश्क की ज़ियारत जिसे

सदाएँ

करीबी से हमारे क्या पाओगे
तूफानी दरिया में तुम भी बह जाओगे

संभालना मुश्किल होगा
इस कश्ती का
मेरे माँझी, इन लहरों से पार
कहाँ पाओगे

टकराए कश्ती से जो बारबार
उन लहरों की रज़ा क्या है
तुम कहाँ समझ पाओगे

है और इबादत की
बची नहीं कुव्वत मुझमें
क्या फिर कभी
मेरी खोई हुई
सदाएँ बन पाओगे

तुम हो

आन हो
अरमान हो
ज़िंदा हूँ
इसकी पहचान हो

मुकाम हो
मंज़िल की निशान हो
खुदा का भेजा
नेक पैग़ाम हो

नादान हो
आलिशान हो
मेरी ज़मीं
मेरा आसमान हो

Wednesday, October 12, 2016

फिर वीराना

उसने मेरा काम आसान कर दिया
अपने दर से मुझे अनजान कर दिया

किसी तबाही की अब जरूरत नहीं
मेरी गली यूँही वीरान कर दिया

बग़ैर जले मोम पिल के बह गए
रंग-ए-लफ़्ज़ बिन सब बेरंग रह गए

दिए जलाये थे पड़ोसी ने किसी जश्न में
मेरे अरमां उम्मीद-ए-जुगनू बन गए
कभी इस दिया, कभी उस दिया
तेरी परछाई ढूंढ़ते रह गए

Tuesday, February 16, 2016

तू नहीं

तेरा निशां है, पर तू नहीं
तेरी तलब है, पर कहीं कोई सुकूं नहीं


तेरी आवाज़ व यादें हैं,

और तन्हा करने के लिए

रोके रुकता काफ़िला-ए-आरज़ू नहीं


मिन्नत-ए-दीदार किऐ कई दफ़ा
तुझसे, या तेरे साये से
पर हो पाया रूबरू नहीं

(Written 21 May 2013)

(Photo below is a random sky on NH-31, dated 26 Sep 16)