Tuesday, February 16, 2016

तू नहीं

तेरा निशां है, पर तू नहीं
तेरी तलब है, पर कहीं कोई सुकूं नहीं


तेरी आवाज़ व यादें हैं,

और तन्हा करने के लिए

रोके रुकता काफ़िला-ए-आरज़ू नहीं


मिन्नत-ए-दीदार किऐ कई दफ़ा
तुझसे, या तेरे साये से
पर हो पाया रूबरू नहीं

(Written 21 May 2013)

(Photo below is a random sky on NH-31, dated 26 Sep 16)