Sunday, July 14, 2019

तू शीतल छइयाँ

ज़िन्दगी है धूप सी
तू शीतल छइयाँ

आस पास सब बेरंग सा
तू बन आती सतरंगी मेरी दुनिया

उमस भरी उलझन हर तरफ
तू बहती हवा, लाती बदरिया

पट जाती हरियाली हर तरफ
हँस के तू गुजर जाती जिस डगरिया

तैर जाऊँ समंदर भी तुम तक
क्या साहिल, क्या उफनती कोई दरिया

हर पल काआभास,  है तू मेरे आस पास
चाहे जितनी भी दूर हो तेरी नगरिया

Friday, February 15, 2019

सिसकियाँ

कुछ खरोंच लिए
मलहम ढूंढता
दर तेरे आया था मैं
मांगते हुए तुझसे रहम
मन में तो बहुत सकुचाया था मैं

रोशनी दिखी
दौड़ पड़ा था मैं
राह पत्थर से टकर
फिर से गिरा खुद को पाया था मैं

सन्नाटा था हर कहीं
और थी गूंज सिसकियों की
मेरे खुद के चोट के दर्द में
जिन्हें सुन न पाया था मैं

Saturday, April 8, 2017

तेरी यादें

गुजरते वक़्त को
आवाज़ देते सुना
बिखरी यादों को
जब एक एक करके चुना

तन्हा नहीं
ग़म भी नहीं
बेरंग नहीं
पर रूहानी उमंग भी नहीं

सफ़र कर लेता हूँ खुद ही
वो सारे रास्ते
ढूंढ रखे थे
जो तेरे वास्ते

ग़ज़ल वही
जगह नई
लोग नये
पर आँखों में तस्वीर वही

याद है?
वो पहली बारिश की बुँदे
जब हम साथ
थे धम्म से कूदे

इस बार रास न आया
मिट्टी का यूँही भींगना
और ताज़ी खुशबु
फिर से बिखेरना

अक्सर आकर सहलाती मेरे बालों को
तुम्हारी यादों की उँगलियाँ
वो नर्म सुबह, वो सूर्ख शाम
वो खिलखिलाता हमारा आशियाँ

गुफ़्तगू

उनसे गुफ़्तगू की
तमन्नाओं का सिलसिला
बन के नन्हा घास
जबसे मेरे बगीचे निकला

हर रोज़ सींचा
उम्मीदों ने इसे
हर रोज़ मुर्झाया,
हर रोज़ फिर खिला

तिनके की अहमियत
उनसे क्या जानिए
जिन्हें हर कदम,
नया हमराही आ मिला

ना रोष
दिखाया लहरों ने
ना जिनसे किनारों ने
बढ़ाया कभी फासला

Monday, October 17, 2016

घास

घास
नन्हें कोमल घास
हरयाली के प्रतीक घास

बाग़ बगीचों में घास
राह पगडंडियों पे घास
देसी घास
विदेशी घास

खेल के मैदानों में
खेतों और खलिहानों में
उखड़ती, फिर पनपती घास
कहीं सिंची
कहीं अनसिंची घास

गर्म धूप, बारिश
बर्फ और ओले
सब सहते घास
बढ़ते ही
किसी मवेशी का चारा
बनते घास

ओस की मोतियों को सँजोते घास
नए दिन का एहसास दिलाते घास
खुदपे चलने वालों के तलवे सहलाते घास

इक ज़मी, इक आसमाँ
बिन फले-फूले, बिन कोई आस
खिलती, कुम्हलाती घास
यूँही पनपते, रौंदे जाते घास

ज़मीं जकड़े
बिन चीखे
चुपचाप सहते
खुद में सिमटते घास

रात होने पर
चाँदनी में नहलाते घास
अगली सुबह, फिर तरो ताज़ा
हो जाते घास
फिर बन जाते
किसी की हरियाली के
प्रतीक ये घास

Saturday, October 15, 2016

जब भी मैंने तुमको देखा...




ज़िन्दगी को खिलखिलाते देखा
खुल के झूमते नाचते देखा
पंख लगाये सपनों को
उड़ान भरते देखा
चाहतों को बेबाक,
बेपरवाह होते देखा
सच में, या सपने में
जब भी मैंने तुमको देखा...

झूठ हैं,
हैं सच कई,
किस्से ग़म के,
हैं खुशी के कई,
सब लतीफों को
तुम पर उमड़ते देखा...
सच में या सपने में
जब भी मैंने तुमको देखा...

संगीतों से सजी
इठलाती इतराती
तितलयों को
रंग बिरंगे फूलों पे
मंडराते देखा है
जब भी मैंने तुमको देखा है...

अलसाती धूप
पेड़ों से छन के आती
ओस की बूँदों को
सुनहरा बनाती
तृप्त तन तृण क
किरणों में मदमाते देखा है
सच में या सपनें में 
जब भी मैंने तुमको देखा है...

सागर किनारे,
पीछे बाँह पसारे
जैसे युगल कोई
खोये ख्यालों में
देख रहा हो
चाँदनी और सितारे
उनकी तस्वीर में
खुद को उतरते देखा है....
जब मैंने तुमको देखा है।

Friday, October 14, 2016

सौगात

शाम ढ़लने को है
अब तो रात आ रही है
साथ संगीतों से सजी
तेरी हर बात ला रही है

कुछ क़दम चल के
रुक-सा जाता हूँ मैं
हर राह की मन्ज़िल
तुम तक पाता हूँ मैं

अब यूँ ठहरकर, क्यूँ देर कर रहा
छोटी मुश्किलों से क्यूँ बेवज़ह डर रहा

क्या कहें तुम्हें, सब कह तो दिया
सब फैसले तुम्हारे, बस इंतज़ार है लिया

ये रात कब ढलेगी
कब सुबह आएगी
साथ आहट की तेरी
कब सौगात लाएगी?

(11 Aug 2002)