Sunday, October 20, 2013

परछाई


सहसा सिमट गई वो बाहें
गुम हो चली वो लंबी राहें
धूप ही धूप फैला हर तरफ
जाने, कहाँ जा छुपी है छाँहें

खत्म हो चला एक सफर शायद
फरियाद भी है अब बेअसर शायद
दिये थे उम्मीद के तुम्ही बस
वो भी बुझने पर आज तुला शायद

इतनी हसरतें, इतने वादे
हंसी ख्वाब, और हंसी इरादे
कैसे भूलें? कैसे बिसरें?
अब तक के हमसफर, तू ही बता दे?

किसी की मौत की चुप्पी है
या किसी तबाही का मातम
कुछ भी, कोई भी तो नहीं दूर-दूर
बस ना-उम्मीदी और हम

क्यूं यूँ लगा की तुम करीब आ गए थे,
ठीक अभी, इस पल से पहले,
सचमुच, ज़मीं पर, यहीं मेरे सामने
सोचा, चलो, यही ज़िंदगी है, लगा लें गले

पर नहीं, फिर करा दिया तुमने यकीं,
कि तुम अभी दूर थी, बहुत दूर
जो था मेरे मन में अब तक
बस था एक फितूर

और वो जो था स्थिर दरिया में
देख जिसे, छलांग लगाने की सोच रहा था
बस तुम्हारी परछाई थी
नहीं, तू इतनी भी करीब नहीं आई थी।

(The Baobab tree, also known as Adansonia, was photographed in the Western DR of Congo)

Wednesday, October 16, 2013

हसरत



न हसरत हमें सितारों की
न अरमां गुल-ओ-बहारों की
तू संग मेरे मझधार में भी
तो फ़िक़्र किसे किनारों की

कुछ धुआँ-धुआँ सा है दीख रहा
सूरज भी आँखें है मीच रहा
तुम साथ मेरा तो दोगी ना
ग़र लौ बुझ जाये चिरागों की

मीठी बातें सब सुन लेते हैं
है तुमपे यकीं, ये कह लेते हैं
कहो बाँह थामोगी तब भी तुम
ग़र आई रूत सर्द बयारों की

ये काली घटा, ये गहरे झील
चहकती ज़ुबां और थिरकती पलकें 
क्‍यूं और कहीं पे देखें हम 
क्या कमी यहाँ नज़ारों की?

न चाहत किसी इमारत की
न चाहूँ राह ज़न्नत की 
बस अपना तेरा आंचल हो 
तो फ़िक़्र किसे छत-ओ-दीवारों की?


(03 Dec 2002)

Friday, October 11, 2013

बेरुख़ी


उनकी बेरुख़ी एक खुला राज़ तो नहीं
पर उसपे कोई पर्दा भी नहीं।

यहाँ दर्द दिखाकर हासिल क्या है?
पर छुपाए, अश्‍क़ छुपता भी नहीं।

इस क़दर परेशां हैं जुगनू सारे,
जलने को राजी थे पर रात ही आई नहीं।

ख़्वाब मिलकर बुने थे, बिखर गये तो क्या?
मंज़िलें और भी हैं, बस वो हमसफर नहीं।

सदाएं मिट रहीं हलक से, आपके पुकार में,
पर इस मौत के बाद भी, होंगे खामोश नहीं।

(written 28 March 2002)

शौर्य तेजो युद्धे



अक्सर उसने लगाई धावा की बोली
जैसे बंदूक से निकली हो कोई गोली।

बारूदी सुरंगों को छेदता
विघ्न बाधाओं को भेदता
बढ़ चला वो,
देखो, चढ़ चला वो।

सुख दु:ख में मौन है
यह अडिग नर भला कौन है?
उत्साही है, वह मतवाला है
आँखों से उड़ेलता ज्वाला है।

ललाट पर अपार तेज है,
ज्यों सूरज भी निस्तेज है।
यम देख उसे रुक जाता है,
भय, देखो, झुक जाता है, छुप जाता है।

साहस अदम्य अपार है,
दुश्मनों में मचाया हाहाकार है।

रिपु का दिल दहलाने को
सत्य मार्ग प्रशस्त बनाने को,
शपथ जिसने ठानी है
यह उस वीर सपूत की कहानी है।

युद्धपथ का सुदृढ़ राही है,
भारत माँ का वीर सिपाही है।



(2005. Published in OTA, Chennai Journal)

हम क्यूँ हैं




किस शख्सियत की पहचान हैं?
किस अहमियत का पैगाम हैं?
क्या वो हमें हरपल देख रहा
जिसके प्रयोगों का परिणाम हैं?

दर्द क्या उसी ने बांटे?
क्या खुशियाँ उसी की नेमत हैं?
क्या आंसू उसी ने पिरोये नैनों में?
क्या होठों की हँसी उसी की रहमत है?

मक़सद होगा उसके अठखेलियों का क्या?
कब होगा हमें मालूम उसकी रज़ा?
हम कौन हैं? हम क्यूँ हैं?
मेरे खुदा खुद ही तू दे हमें बता!