गुजरते वक़्त को
आवाज़ देते सुना
बिखरी यादों को
जब एक एक करके चुना
तन्हा नहीं
ग़म भी नहीं
बेरंग नहीं
पर रूहानी उमंग भी नहीं
सफ़र कर लेता हूँ खुद ही
वो सारे रास्ते
ढूंढ रखे थे
जो तेरे वास्ते
ग़ज़ल वही
जगह नई
लोग नये
पर आँखों में तस्वीर वही
याद है?
वो पहली बारिश की बुँदे
जब हम साथ
थे धम्म से कूदे
इस बार रास न आया
मिट्टी का यूँही भींगना
और ताज़ी खुशबु
फिर से बिखेरना
अक्सर आकर सहलाती मेरे बालों को
तुम्हारी यादों की उँगलियाँ
वो नर्म सुबह, वो सूर्ख शाम
वो खिलखिलाता हमारा आशियाँ