तेरा निशां है, पर तू नहीं
तेरी तलब है, पर कहीं कोई सुकूं नहीं
तेरी आवाज़ व यादें हैं,
और तन्हा करने के लिए
रोके रुकता काफ़िला-ए-आरज़ू नहीं
मिन्नत-ए-दीदार किऐ कई दफ़ा
तुझसे, या तेरे साये से
पर हो पाया रूबरू नहीं
(Written 21 May 2013)
(Photo below is a random sky on NH-31, dated 26 Sep 16)
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