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| (Capturing the spirit of Bandra Band Stand, 11 Jan 2014, 01:09 AM, SAMSUNG, GT-S7562) |
न तुम हवा हो
न मैं इक तिनका
फिर भी क्यूँ उड़ता
तेरी संगत मे आके
कभी छू रहा होता
उँचाइओं को
कभी धम्म से गिरता
आके ज़मीं पे
झोंके हवा के उड़ा ले जाते,
जैसे हो अरमां निकले तुम्हारे.
कभी फूलों कि बगिया
कभी घूमते हम नदिया किनारे
न ठहरना तुम जानते हो,
न खुद उड़ना मैं जनता हूँ
तुम्हारा साथ पा के
फिर क्यूँ पूरा खुद को मानता हूँ
कई तिनके तुम्हें और मिल जाते
मिलती मुझे कहाँ फिर हवा, बोलो , ऐसी?
बड़े ऐब देखे होंगे मुझमें,
लिखता तुमपे कहाँ, कोई गीत ऐसी, बोलो

Lines I liked most here
ReplyDeleteन ठहरना तुम जानते हो,
न खुद उड़ना मैं जनता हूँ
तुम्हारा साथ पा के
फिर क्यूँ पूरा खुद को मानता हूँ
depth hai lekhni mei..do baar padhna pada...then i floated too with your poetry! jitey raho aur likhte raho..
Wah ! Wah !
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