Saturday, October 15, 2016

जब भी मैंने तुमको देखा...




ज़िन्दगी को खिलखिलाते देखा
खुल के झूमते नाचते देखा
पंख लगाये सपनों को
उड़ान भरते देखा
चाहतों को बेबाक,
बेपरवाह होते देखा
सच में, या सपने में
जब भी मैंने तुमको देखा...

झूठ हैं,
हैं सच कई,
किस्से ग़म के,
हैं खुशी के कई,
सब लतीफों को
तुम पर उमड़ते देखा...
सच में या सपने में
जब भी मैंने तुमको देखा...

संगीतों से सजी
इठलाती इतराती
तितलयों को
रंग बिरंगे फूलों पे
मंडराते देखा है
जब भी मैंने तुमको देखा है...

अलसाती धूप
पेड़ों से छन के आती
ओस की बूँदों को
सुनहरा बनाती
तृप्त तन तृण क
किरणों में मदमाते देखा है
सच में या सपनें में 
जब भी मैंने तुमको देखा है...

सागर किनारे,
पीछे बाँह पसारे
जैसे युगल कोई
खोये ख्यालों में
देख रहा हो
चाँदनी और सितारे
उनकी तस्वीर में
खुद को उतरते देखा है....
जब मैंने तुमको देखा है।

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