शाम ढ़लने को है
अब तो रात आ रही है
साथ संगीतों से सजी
तेरी हर बात ला रही है
कुछ क़दम चल के
रुक-सा जाता हूँ मैं
हर राह की मन्ज़िल
तुम तक पाता हूँ मैं
अब यूँ ठहरकर, क्यूँ देर कर रहा
छोटी मुश्किलों से क्यूँ बेवज़ह डर रहा
क्या कहें तुम्हें, सब कह तो दिया
सब फैसले तुम्हारे, बस इंतज़ार है लिया
ये रात कब ढलेगी
कब सुबह आएगी
साथ आहट की तेरी
कब सौगात लाएगी?
(11 Aug 2002)
Good...achy hai..
ReplyDeleteGood...achy hai..
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