अक्सर उसने लगाई धावा की बोली
जैसे बंदूक से निकली हो कोई गोली।
बारूदी सुरंगों को छेदता
विघ्न बाधाओं को भेदता
बढ़ चला वो,
देखो, चढ़ चला वो।
सुख दु:ख में मौन है
यह अडिग नर भला कौन है?
उत्साही है, वह मतवाला है
आँखों से उड़ेलता ज्वाला है।
ललाट पर अपार तेज है,
ज्यों सूरज भी निस्तेज है।
यम देख उसे रुक जाता है,
भय, देखो, झुक जाता है, छुप जाता है।
साहस अदम्य अपार है,
दुश्मनों में मचाया हाहाकार है।
रिपु का दिल दहलाने को
सत्य मार्ग प्रशस्त बनाने को,
शपथ जिसने ठानी है
यह उस वीर सपूत की कहानी है।
युद्धपथ का सुदृढ़ राही है,
भारत माँ का वीर सिपाही है।
(2005. Published in OTA, Chennai Journal)


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