Friday, October 11, 2013

बेरुख़ी


उनकी बेरुख़ी एक खुला राज़ तो नहीं
पर उसपे कोई पर्दा भी नहीं।

यहाँ दर्द दिखाकर हासिल क्या है?
पर छुपाए, अश्‍क़ छुपता भी नहीं।

इस क़दर परेशां हैं जुगनू सारे,
जलने को राजी थे पर रात ही आई नहीं।

ख़्वाब मिलकर बुने थे, बिखर गये तो क्या?
मंज़िलें और भी हैं, बस वो हमसफर नहीं।

सदाएं मिट रहीं हलक से, आपके पुकार में,
पर इस मौत के बाद भी, होंगे खामोश नहीं।

(written 28 March 2002)

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