Wednesday, October 16, 2013

हसरत



न हसरत हमें सितारों की
न अरमां गुल-ओ-बहारों की
तू संग मेरे मझधार में भी
तो फ़िक़्र किसे किनारों की

कुछ धुआँ-धुआँ सा है दीख रहा
सूरज भी आँखें है मीच रहा
तुम साथ मेरा तो दोगी ना
ग़र लौ बुझ जाये चिरागों की

मीठी बातें सब सुन लेते हैं
है तुमपे यकीं, ये कह लेते हैं
कहो बाँह थामोगी तब भी तुम
ग़र आई रूत सर्द बयारों की

ये काली घटा, ये गहरे झील
चहकती ज़ुबां और थिरकती पलकें 
क्‍यूं और कहीं पे देखें हम 
क्या कमी यहाँ नज़ारों की?

न चाहत किसी इमारत की
न चाहूँ राह ज़न्नत की 
बस अपना तेरा आंचल हो 
तो फ़िक़्र किसे छत-ओ-दीवारों की?


(03 Dec 2002)

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