इन दिनों
गुजरता हूँ कई इम्तहानों से
बेबस और बेसब्र हो उठता
छोटी खुशिओं और अरमानों से
है न ज़रिया
न दूकान कहीं
तुम्हारा साथ मिलना
क्यूँ इतना आसान नहीं
शब्द ख़त्म हो गए
है चाह वही
तुझसे शुरू और ख़त्म
हर राह नई
प्यासा तेरा
किस्से कशमकश के कहता किसे
फिर भी बढ़ा बाबरा
उस राह पे
कहते इश्क की ज़ियारत जिसे
No comments:
Post a Comment