Friday, October 14, 2016

ये ज़िंदगी

क्यूँ असमंजस सी ज़िन्दगी
दिखती, कभी दूर, कभी पास है
अस्त व्यस्त हो कभी
कभी संजीदा-सा एहसास है

धड़-पकड़ में लगे हुए
हम किन खुशियों के
क्या यही खुशियाँ हैं
या सूखा आभास है

उम्मीदों के नगर में
बुने थे सपने कई
सपने हैं सलामत अभी भी
पर कई उलझनों के हम दास हैं

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